सनातन धर्म क्या है?

सनातन धर्म उस जल की तरह है, जो बिना रुके सतत बहता रहता है। वह किसी एक ही किताब को पकड़कर रुकता नहीं है बल्कि आवश्यक जोड़-घटाव करके धर्म को प्रासंगिक और उपयोगी बनाता है। सनातन धर्म की असाधारण विशिष्टता है कि वह विज्ञान की जैसे प्रयोग कर सनातन विचारों को मानव कल्याण के लिए उतारता है।

शास्त्री कोसलेन्द्रदास – दर्शन एवं योग विभाग प्रमुख, जगद्गुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर

संस्कृत शब्द ‘सनातन’ का संयोग लोकसभा चुनाव से हो गया है। इस पर हो रही चुनावी चर्चा का इसके वास्तविक स्वरूप से कोई लेना-देना नहीं है। बौद्ध संन्यासी अमर सिंह द्वारा चौथी सदी में लिखे शब्दकोष ‘अमरकोष’ में शाश्वत, ध्रुव, नित्य और सदातन शब्द सनातन के पर्याय हैं। इसे अनुसार सनातन का तात्पर्य उससे है, जो सदा बना रहता है। एक अन्य प्राचीन प्रयोग ब्रह्मांड पुराण में है, जहां सनातन शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है – ‘सना’ का तात्पर्य हमेशा और ‘तन’ का अर्थ विद्यमान है। इसके अनुसार सनातन का अर्थ हमेशा बने रहने-से है। ‘मनुस्मृति’ में सनातन शब्द इसी निश्चल अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।

प्राच्य विद्याओं के मनीषी गोपीनाथ कविराज ने लिखा है – ‘जो स्वाभाविक है, वही सनातन है। इसके विपरीत जो कृत्रिम है, वह अस्थायी है।’ वैदिक धर्म के नित्य आदर्श सनातन कहलाते हैं। ये सत्य, आर्जव, दया, दान, अहिंसा और निर्लोभ हैं। यह सनातन जब धर्म का विशेषण हो जाता है, तो वह सनातन धर्म कहलाता है। जो जीवन मूल्य समाज के उत्कर्ष के लिए अनिवार्य माने गए हैं, वे सनातन धर्म कहे गए हैं। रामायण के ‘एष धर्म: सनातन:’ श्लोक में प्रयुक्त सनातन धर्म शब्द जो बहुत पहले मान लिया गया हो ऐसे कर्तव्य के अर्थ में आया है। वहीं, जो अब प्रचलित न हो ऐसे प्राचीन प्रयोग के संदर्भ में सनातन शब्द महाभारत में है। अध्येताओं का कहना है कि सनातन शब्द वैदिक संहिताओं में नहीं आया पर गीता में श्रीकृष्ण ने जीव को अपना अंश बताते हुए उसे सनातन कहा है। तथागत बुद्ध ने धर्म-चक्र प्रवर्तन करते समय पालि भाषा में कहा था -‘एसो धम्मो सनंतनो’ अर्थात यह सनातन धर्म है, जिसे वे पुनर्व्याख्यायित कर रहे हैं।

भारत रत्न डॉ. पांडुरंग वामन काणे के ‘धर्मशास्त्र का इतिहास’ के अनुसार सनातन धर्म का एक पुराना प्रयोग माधव वर्मन के खानपुर पत्रक में है, जिसके संपादक डॉ. वीवी मिराशी के अनुसार यह लेख छठी शती का है। एक अन्य प्रयोग ब्रह्मांड पुराण में है, जिसमें लिखा है कि अद्रोह, अलोभ, तप, दया, इंद्रिय दमन, ब्रह्मचर्य, सत्य, करुणा, क्षमा और धारणा सनातन धर्म के मूल हैं। जो इन गुणों से रहित है, वह सनातन धर्म का विरोधी है।

सनातन धर्म उस जल की तरह है, जो बिना रुके सतत बहता रहता है। वह किसी एक ही किताब को पकड़कर रुकता नहीं है बल्कि आवश्यक जोड़-घटाव करके धर्म को प्रासंगिक और उपयोगी बनाता है। सनातन धर्म की असाधारण विशिष्टता है कि वह विज्ञान की जैसे प्रयोग कर सनातन विचारों को मानव कल्याण के लिए उतारता है। पर इन दिनों जब उसमें कुछ सुधारों या सुझावों की चर्चा होने लगती है तो अनुदारवादी, रूढ़िवादी या नवविद्वेषी लोग ऐसा तर्क उपस्थित करते हैं कि हमारा धर्म तो ‘सनातन’ है, अतः इसमें किसी प्रकार का सुधार या परिवर्तन नहीं किया जाना चाहिए। वस्तुत: सनातन शब्द से यह अर्थ नहीं निकालना चाहिए कि धर्म के नियम सदैव स्थिर रहते हैं और सनातन निर्विकार एवं नित्य है। उन शब्दों का अर्थ यही है कि हमारी वैदिक संस्कृति अत्यधिक प्राचीन है, जिसके पीछे एक लंबी परंपरा है। सनातन के नाम से पहचाने जाने वाली हिंदू संस्कृति कभी नहीं कहती कि धर्म में परिवर्तन की गुंजाइश नहीं है। वास्तव में धारणाओं, विश्वासों, लोकाचारों एवं प्रयोगों में परिवर्तन प्राचीनकाल से लेकर अब तक विविध उपायों द्वारा होते रहे हैं। विचार करने की स्वतंत्रता का एक श्रेष्ठ उदाहरण सनातन धर्म में ही संभव है कि अति प्राचीन काल में वेद ही सब कुछ था पर उपनिषदों में यह धारणा परिवर्तित हो गई। मुंडकोपनिषद ने वेदों को अपरा विद्या के अंतर्गत रखा है और ब्रह्मज्ञान को परा विद्या माना है। वैदिक काल में यज्ञों का संपादन महत्त्वपूर्ण धार्मिक कृत्य था पर उपनिषदों ने यज्ञों को छिद्रयुक्त नौकाओं की संज्ञा दे डाली और यज्ञों को श्रेष्ठ कहने वाले लोगों को मूर्ख कह डाला। मनु, याज्ञवल्क्य, विष्णु-धर्मसूत्र और विष्णु-पुराण ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जब धर्म लोगों के लिए अरुचिकर हो जाए एवं कष्ट उत्पन्न करे तो उसका पालन नहीं होना चाहिए बल्कि उसे छोड़ देना चाहिए। महाभारत में स्पष्ट रूप से आया है कि जो कभी किसी युग में अधर्म था वह कभी धर्म हो सकता है क्योंकि धर्म एवं अधर्म काल और देश की सीमाओं से आबद्ध हैं।

एक वर्ग स्वयं को सनातनी कहता है और विश्वास रखता है कि सनातन की स्थापना विचारशील ऋषि-मुनियों द्वारा हुई है। दूसरे लोगों का मानना है कि सनातन संस्कृति के आवश्यक मूल्यों को नींव के रूप में रखकर उस पर आज के काल की आवश्यकताओं के अनुसार नवनिर्माण होना चाहिए। वस्तुत: हिंदू धर्म में सदैव परिवर्तन होते रहे हैं, जिनके फलस्वरूप भारत के विभिन्न भागों में विधि-विधानों, लोकाचारों, प्रयोगों, धार्मिक एवं आध्यात्मिक मतों के विविध स्वरूप प्रकट हुए हैं। भारतीय दर्शन की समृद्ध चिंतन परंपरा को जानकर ही सनातन धर्म पर चर्चा हो सकती है, जिसमें विविध प्रमाणों से तत्त्व का निरूपण हुआ है। आस्तिक और नास्तिक में विभक्त इस दर्शनशास्त्र ने हिंदू चिंतन को असाधारण बनाकर उसे सनातन स्थान पर प्रतिष्ठित किया है।  

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