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रोशनी का दिव्यबोध फैलाती दीपावली

लक्ष्मी की आराधना होनी चाहिए क्योंकि लक्ष्मी का संबंध धन से नहीं वरन उसकी पवित्रता से है। लक्ष्मी अशुद्ध, अपवित्र और अप्राकृतिक से कभी नहीं जुड़ती। इस नाते जिसका आस्वादन-भोजन अशुद्ध है, जिसकी भाषा-वाणी अपवित्र है, जिसका संस्कार-विहार अप्राकृतिक है, वह लक्ष्मी का आशीर्वाद कैसे प्राप्त कर सकता है। सच्ची और स्थाई लक्ष्मी वही है जो शील और मर्यादा से पायी जाए।

-शास्त्री कोसलेन्द्रदास

कार्तिक मास के बीचों-बीच दीपावली आई तो अपावन अंधेरी अमावस्या प्राण और चेतना के उजाले से जगमगा उठी। हर साल दीपावली तरह-तरह के सुखद समाचार लेकर आती है। खेत-खलिहान, बाग-बगीचे और राह-डगर में पसरे अंधेरे-उजाले के बीच चैतन्य सेतु बनाती दीपावली का आना सनातन परिपाटी है, जो पुराकाल में शुरू हुई। यह तेज, दीप्ति, द्युति, प्रकाश और प्रभा के मनोभावों का पर्व है। दीपावली विलास और मादकता की अंधेरी लंका को मिटाने वाले श्रीराम की अयोध्या नगरी जैसी प्रकाशित है। दीपावली की रात घोर अंधेरे के बीच प्रकाश की शक्ति सगर्व सिर उठाकर फूट पड़ती है तो देखते ही लगता है कि एक नन्हें से अग्निगर्भ दीप ने आसपास के सारे अंधकार को पराजित कर दिया। उसने अज्ञान के तमस को हरा दिया। यह नन्हा-सा दीप, दीप नहीं भगवती महालक्ष्मी का मुख है। आश्चर्य है कि यह दीप अपनी चोटी में अग्नि बांधकर कैसे धरती पर उतरा होगा! कब इसने धरती को पहले-पहल अपनी आभा से आच्छादित किया होगा!

कोई नहीं जानता कि दीपावली कब से मनाई जा रही है! यह सनातन है, उसी तरह जैसे सनातन धर्म है। कौन जानता है कि सनातन धर्म कब से चला आ रहा है! किसने पहली बार मिट्टी से बने दीप में रूई और तेल का संयोग कर उन्हें अग्नि से मिलाया होगा? किस महामानव ने गगन में चमचमाते ज्योतिर्मय सूर्य और चंद्रमा के प्रतिनिधि दीप को धरा पर उतारकर अंधेरे से बचने की कोशिश की होगी! अग्नि देवता को सुंदर थाली में सजाकर उसे दीपावली की रात लक्ष्मी पूजा से जोड़ा होगा। यह प्रयोग आज भी इतना अनूठा है कि जाति-भेद और अमीरी-गरीबी की कठोरताओं के बावजूद उसने पूरे भारतीय समाज को एकता में बांध रखा है। कितनी ही धर्म-साधनाएं, जातीय विश्वास और आचार पद्धतियां बदली पर दीपावली में सबकी स्वतंत्र स्मृतियां बनी हुई हैं।

भारत में पनपे धर्मों और संप्रदायों के भीतर दीपावली मिलन भूमि है। दीपावली की रात पूजी जा रही माता लक्ष्मी बौद्ध साहित्य में आचार्या, भगवती, भट्टारिका, महाचार्यश्री आदि विशेषणों के साथ स्मरण की गई है। यक्षपूजा से बौद्ध और शाक्त मार्ग में ‘श्री-सुंदरी’ की साधना का प्रवेश हुआ है। पुराने जमाने में यक्षों की पूजा दीपदान से होती थी। रात भर दीप जलाकर यक्षों को प्रसन्न किया जाता था। पौराणिक काल में पूरे कार्तिक महीने में दीपदान की शास्त्र विधि शुरू हुई। आकाशदीप के रूप में बांस के सहारे ऊंचाई पर दीप जलाने की परंपरा चल पड़ी। इस धार्मिक भावना का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन काल दीपावली है, जब चारों ओर अनगिनत दीप जगमगाते हैं।

भारतरत्न डॉ. पांडुरंग वामन काणे की प्रसिद्ध पुस्तक ‘धर्मशास्त्र का इतिहास’ के अनुसार रक्षाबंधन, विजया दशमी, दीपावली तथा होली मानव मात्र के पर्व व त्योहार हैं, जो समान रूप से मनाए जाते हैं। काणे ने दीपावली के सुखरात्रि, यक्षरात्रि तथा सुखसुप्तिका जैसे पौराणिक नाम लिखे हैं। इसमें पांच दिनों तक चलने वाले कृत्य होते हैं। धन पूजा, नरक चतुर्दशी, लक्ष्मी पूजा, अन्नकूट तथा भाईदूज। इनमें खास है भगवती महालक्ष्मी की पूजा का विधान। ऋग्वेद के ‘श्रीसूक्त’ में लक्ष्मी को धरती कहा गया है।

दीपावली है यक्षरात्रि
कार्तिक की अमावस्या को जब दीपावली मनाई जाती है, वात्स्यायन के समय में ‘यक्ष-रात्रि’ उत्सव मनाया जाता है। दीपावली उत्सव का पुराणों, धर्मसूत्रों, कल्पसूत्रों में विस्तृत रूप से पाया जाता है किंतु अचरज है कि कामसूत्र में दीपावली का जिक्र ‘यक्ष-रात्रि’ के रूप में है। यक्ष-रात्रि से यही अनुमान लगाया जाता है कि इस दिन यक्षों के राजा कुबेर की पूजा होती थी। दूसरी व्याख्या से लक्ष्मी पूजा की रात्रि अर्थ भी निष्पन्न होता है। प्राचीन काल में शायद दीपावली उत्सव शास्त्रीय या धार्मिक विधि रूप में नहीं मनाया जाता रहा है क्योंकि वेदों और ब्राह्मण ग्रंथों में दीपावली का उल्लेख नहीं है। पद्मपुराण, स्कंदपुराण और मनुस्मृति में दीपावली का विस्तृत वर्णन है। उसी आधार पर दीपावली का प्रचलन है। कार्तिक की अमावस्या के साथ ‘यक्ष’ शब्द जोड़ने का तात्पर्य ‘श्रीसूक्त’ से स्पष्ट होता है, जो ऋग्वेद के परिशिष्ट भाग का एक सूक्त है। इस सूक्त के एक मंत्र में ‘मणिना सह’ शब्द का प्रयोग है। इस मणि का संबंध ‘मणिभद्र यज्ञ’ से है, जिसका यक्षों से संबंध होने से कामसूत्र के काल तक दीपावली की रात यक्षरात्रि कहलाती है।

भगवती लक्ष्मी भगवान नारायण के साथ प्रतिष्ठित हैं। वे श्री, शोभा, समृद्धि और सौभाग्य के रूप में स्थापित हैं। धीरे-धीरे तिजोरियों में बंद रुपए-पैसे का पूजन लक्ष्मी के रूप में चल पड़ा। यह सही है कि जीवन के लिए धन का होना बहुत जरूरी है। धन के होने पर मानव जीवन सहजता से चलता है, वहीं धन के अभाव में विद्वान भी सिर्फ साधारण होकर रह जाते हैं। स्थिर लोग महाक्रोधी लगते हैं। दृढमति जिद्दी दिखते हैं। क्षमाशील बन छोटे जाते हैं और नीतिज्ञ लोग कपटी दिखने लगते हैं। ऐसे में लक्ष्मी को प्रसन्न कर धन प्राप्त करने के लिए दीपावली की रात विभिन्न काम्य अनुष्ठान चल पड़े, जिससे धन पाकर जीवन आसानी से लिया जा सके।

अग्नि है प्रथम शब्द
मानव इतिहास के सर्वाधिक पुरातन ग्रंथ ‘ऋग्वेद’ की शुरूआत जिस शब्द से होती है, वह शब्द है अग्नि। अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्…’ में ऋषि मन की सार्वभौम प्रार्थना है, जिसके हिसाब से अग्नि के बिना सारा संसार सूना है। वह वायु से उत्पन्न हुई है। और जल और पृथ्वी को पैदा करती है। अग्नि पांच महाभूतों की केंद्र है। तैत्तिरीय—उपनिषद के सृष्टि विस्तार में पैदा हुए पंच महाभूतों में अग्नि तीसरा तत्त्व है। आकाश से वायु की उत्पत्ति हुई और वायु से अग्नि की। अग्नि ने जल को उत्पन्न किया और जल से पृथ्वी पैदा हुई। पृथ्वी पर औषधियां और औषधियों से अन्न हुआ। यही अन्न मानव के जीवन का आधार है।

महर्षि गौतम ने न्याय दर्शन में पंच महाभूतों के साथ काल, दिशा, आत्मा और मन जुड़ गए। यहां अग्नि एक तरह से तेज है। जिसका स्पर्श उष्ण है, ऐसा द्रव्य तेज है। तेज के चार भेद भौम, दिव्य, उदर्य और आकरज हैं। अग्नि भूमि पर होने वाला तेज है। जल से उत्पन्न विद्युत दिव्य तेज है। खाए हुए पदार्थों के पाचन का कारण उदर्य तेज है। खान से पैदा हुए स्वर्ण आदि खनिज आकरज तेज हैं। यही कारण है कि परंपरा ने अग्नि के व्यापक स्वरूप को देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया और दीपावली एवं होली जैसे पर्वों में अग्नि की अनिवार्यता स्थापित कर दी।

दीपावली है अमर उत्सव
दीपावली के दिन और रात, दोनों सुंदर हैं। पर वह शोभा रात में पाती है, जब रोशनी की प्रजा के रूप में नन्हें-नन्हें दीप उतरते हैं। इन ज्योतिकलश दीपों की चमकती स्वर्ण आभा-सी लौ अंधेरे को चीरकर प्रकाश की विजय पताका फहराती है। इस नाते परंपरा का अलौकिक बोध ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ यानी अंधेरे से लड़ने की प्रेरणा है। अंधेरा अनादि है, जो प्रकाश से भले पुराना है पर अनंत नहीं है। क्योंकि उसका विनाश होता है। अंधेरा अज्ञान है, जो ज्ञानरूपी प्रकाश से हार जाता है।

जब सूर्य, चंद्रमा और तारे अस्त हो जाते हैं तो मनुष्य इन्हीं दीपों के सहारे बचा रहता है। सूर्य और चंद्रमा ने अस्त होते-होते संसार को अंधेरे से बचाने के लिए अपनी किरणें दीप को दे दी। तभी तो तिमिर को चुनौती देता हुआ दीप ललकार कर अंधेरे से कहता है, ‘अंधकार, तू संसार को ढकने का साहस मत कर। सूर्य और चंद्रमा यदि अस्त हो भी गए तो क्या हुआ? क्या तू मुझे नहीं देख रहा, जो अपनी किरणों की लहरों से आकाश को परिप्लुत कर रहा हूं।’ इतना कहकर वह पुरुषार्थी दीप अंधियारे की पांत को पीकर उसे काजल के रूप में उगलकर अपनी विजय पताका फहरा देता है।

असाधारण हैं दीप
जगमगाते दीप देवोपम भूमिका निभाते हैं। देहरी पर धरा दीप भीतर और बाहर, दोनों ओर उजियारा करता है। गोस्वामी तुलसीदास भगवान श्रीराम के नाम को ‘मणि दीप’ कहते हैं, जिसे जपने से अंदर और बाहर, दोनों ओर उजाला होता है। शास्त्र दीप को निर्जीव नहीं, वरन देवता मानते हैं – भो दीप देवरूपस्त्वम्…। दीप के देवता में परिवर्तित हो जाने का एक सुंदर इतिहास है। धार्मिक विधि में दीप का साक्ष्य होना जरूरी है। उससे आरती और अनुष्ठान पूरे होते हैं। पुराकाल में अग्नि को बचाए रखने के तमाम उपायों में दीप सबसे आसान तरीका था। जब अग्नि की जरूरत पड़ती तो बाती से बाती मिला दी जाती थी। ऐसे में वह सहारा था जीवन का और सारे लौकिक व्यवहारों का। वेदभाष्यकार महर्षि यास्क के अनुसार ‘भरत’ का अर्थ आदित्य है और उससे उत्पन्न प्रजा ‘भारती’ है। इस प्रकार भारत शब्द का सही और सच्चा अर्थ है सूर्य संतान। तात्पर्य है कि भारत शब्द का मतलब ही प्रकाशमय है, जो हमेशा दीपोत्सव मनाता है।

दीप का प्रकाश पर्व
दीपावली का त्योहार भारतीय मनोभूमि से गहरा जुड़ा है, क्योंकि रोशनी से भारत का पुराना रिश्ता है। इसी रिश्ते ने दीपों की माला के त्योहार का सृजन किया। इस दीपमाला की शोभा अलौकिक है। दीप की जिजीविषा चरम सुंदर है। कपास की बाती वाले दिये की नस-नस में प्रवाहित तेल अपनी चेतना से ज्ञान-प्रकाश की रोशनी फैला रहा है। दीपावली मिट्टी से बने दीपों का प्रकाश पर्व है। इन्हें मानव ने अपनी कर्म साधना से बनाया है। यह वैदिक यज्ञ संस्कृति का लघु स्वरूप है। भाषाविदों का यह भी मानना है कि ‘रोशनी’ ईरानी शब्द है, जिसका मूल संस्कृत रूप ‘रोचना’ है। रोचना का मतलब द्युति है। इसी नाते माता लक्ष्मी का एक नाम ‘रोचनावती’ है। यह भी विश्वास था कि परंपरा नारी में तेज और दीप्ति का प्राधान्य देखती है। इसी से विवाहिता नारी के नाम के साथ ‘देवी’ और कन्या के साथ ‘कुमारी’ शब्द जोड़े गए, जो बड़े ही अर्थगंभीर और महिमामय शब्द हैं। पर  अब इनका प्रयोग लगभग समाप्त ही हो गया है, जो स्त्री के दिव्य स्वरूप को व्यक्त करता है।

दैवीय पर्व दीपावली
दीप दैवीय शक्ति का प्रतीक है। प्रश्र है कि दीप क्यों व किसके लिए जलाएं? कभी लगता है कि मौजूदा काले व कपटी परिवेश में माता लक्ष्मी का आवाहन और पूजन करना बेतुका है। वैदिक संस्कृति ने जिस लक्ष्मी को दीपावली की तामसी रात में पूजा, वह बैंकों में कैद धनरूपी लक्ष्मी नहीं थी। ऋषियों का तात्पर्य उस लक्ष्मी से था, जो अमृत और चंद्रमा की बहन, समुद्र की पुत्री और भगवान नारायण की प्रिया है। वेद कहते हैं कि माता लक्ष्मी सुखी दाम्पत्य, स्वादिष्ट अन्न, लहलहाती फसल तथा गौ माता से जुड़ी है। इसलिए यह मानकर लक्ष्मी की आराधना होनी चाहिए कि लक्ष्मी का संबंध धन से नहीं वरन चरित्र और धन की पवित्रता से है। लक्ष्मी अशुद्ध, अपवित्र और अप्राकृतिक से कभी नहीं जुड़ती है। जिसका आस्वादन-भोजन अशुद्ध है, जिसकी भाषा-वाणी अपवित्र है, जिसका संस्कार-विहार अप्राकृतिक है, वह लक्ष्मी का आशीर्वाद कैसे प्राप्त कर सकता है। सच्ची और स्थाई लक्ष्मी वही है जो शील और मर्यादा से पायी जाए।

लक्ष्मी का उपभोग नहीं उपयोग
आचार्य कुबेरनाथ राय लिखते हैं, ‘दीपावली को मनुष्य के हाथों अंधकार पर विजय की रात्रि मानते हैं। मनुष्य के बनाए दीप और उसके द्वारा उपजाए तिलों का तेल इसके साधन-द्रव्य हैं। अंधकार से जूझते इन दीपों के साथ सारी मानव जाति का भावात्मक संबंध है, क्योंकि ये दीप हमारी धरती से ही बने हैं। धरती की बेटी माता सीता के सगे भाई हैं ये दीप। इन दीपों से हमारा गहरा पारिवारिक रिश्ता है। हमारे अपने हाथों से बनाये दीप जब जलने लगते हैं तो देवताओं का तारामंडल फीका पड़ जाता है। सारे अपशकुन तथा सारी अशुभ शक्तियां मनुष्यकृत प्रकाश के सामने नतमस्तक हो अपनी हार मान लेती हैं। दीपावली मनुष्य के लिए गौरव बोध का पर्व है। यह जरूर दुखद है कि कुछ कुटिल दुराचारियों ने दीपावली की पवित्र निशा में ताश खेलने और मद्य पीने की रस्म बना ली है, जिसमें लक्ष्मी का पूजन नहीं बल्कि उसका अपहरण होता है।’

दीपावली श्री, सुख, शोभा, सौभाग्य, शांति, पवित्रता तथा नववधू के गृहप्रवेश की भांति लज्जा, चेतना व आनंद बांटती कमला को पूजने का दिन है न कि दुर्गुणों को अपनाने का। लक्ष्मी का उपयोग होता है, उपभोग नहीं। जो उसके उपभोग का दुस्साहस करता है, वह दशानन रावण जैसी दुर्गति को प्राप्त होता है।

पादुका प्रशासन से मुक्ति
जनश्रुति है कि दीपावली के दिन भगवान श्रीराम 14 वर्षों का वनवास पूरा कर अयोध्या लौटे थे। श्रीराम के लौटते ही दीपावली अयोध्या में पादुका-प्रशासन का मुक्ति पर्व बनी। अयोध्यावासियों ने माना कि पादुका-प्रशासन के दिन लद गए। असली राजा राम और रानी सीता वनवास पूरा कर अयोध्या लौट आए हैं। पादुकाओं की जगह अब श्रीराम राजा होंगे। तभी से राम राज्य की शुरुआत के प्रतीक के रूप में दीपावली पर दीप जलाए जा रहे हैं। राम राज्य की दीपावली शोषणमुक्त और अवदमनरहित समाज की सच्ची प्रतीक है। उसका संदेश व्यक्ति में भीतर बैठे ‘रावण’ को मारकर वहां ‘राम’ को जगाना है।

प्रकाश की किरणें हर साल चेताने आती हैं कि मन की लंका को मारकर वहां अयोध्या बनाओ। जहां बहुत धन-धान्य है, वहां धर्म का गला घुटने लगता है। आज हमारे शहरों के हालात ऐसे ही हैं! नगरों—महानगरों में धन ने ‘ईश्वर’ को बेदखल कर दिया है। दीपावली पर इन शहर में खूब रौनक होगी। पर ये किरणें जिस के दम पर इन शहरों में छाई है, वह है कमजोर, बीमार और शोषित गरीब। वह गरीब सुदूर गांव—ढाणी मेें बैठकर उजाले की आस में बरसों से ‘दीपावली’ की प्रतीक्षा कर रहा है। यह अच्छा है कि श्रीराम की अयोध्या उनके वनवास के 14 सालों में बदली नहीं वरना उसे देखकर श्रीराम की आंखें नम हो जाती। वे अपनी अयोध्या को ही नहीं पहचान पाते! लेकिन अयोध्या में चहुं ओर प्रकाश ही प्रकाश है। अंधेरे के लिए कहीं कोई गुंजाइश नहीं है। क्या राम की दीपावली की किरणें आज की किरणों से मेल खा रही हैं? पापाचार, राजनीतिक अनियंत्रण और भाषा, अन्न, दूध तथा शिक्षा मंदिरों का लगातार प्रदूषित होते जाना दीपावली की किरणों को अयोध्या से दूर कर रहा है। फिर इस दीवाली को राम कैसे पहचानेंगे? दीवाली अंधेरे पर उजाले की जीत का पर्व तो है पर साथ में यह उजाले के आपसी संबंधों के अवलोकन और अन्वेषण का पर्व भी है। कहीं ऐसा न हो कि किसी का उजाला किसी के अंधेरे पर पनप रहा हो! यदि ऐसा है तो वनवास से लौटे राम सरयू में अपने पांव धोए बिना कहीं फिर से दूसरे वनवास में न चले जाएं! तब बिना राम के कैसी दीपावली और कैसे दीप?

महात्मा गांधी की दीपावली
दीपावली शोषित और अवदमित समाज में समानता का वातावरण बना पाए, अपना उजाला वंचितों और अभावग्रस्तों तक फैला सके, तभी वह सच्चे मायने में दीपावली है। मनुष्य मात्र में रोशनी का दिव्यबोध जगा सके। महात्मा गांधी ने 11 सितंबर, 1921 को ‘नवजीवन’ में लिखा – ‘यदि दीपावली पर हमें स्वराज्य न मिल सके तो हमें क्या करना चाहिए? बस मातम मनाना चाहिए। न बढ़िया खाने बनाए जाएं, न दावतें दी जाएं, न नाच-गान किया जाए। बस संयम के साथ रहकर ईश्वर की प्रार्थना की जाए। भरत ने जब चौदह वर्ष तक तपस्या की थी, तब कहीं दीवाली मनाने का समय आया था। अब क्या हम इससे उल्टा चलें? कुसमय में गाना किस काम का? बिना भूख के खाना किस काम का? स्वराज्य के बिना उत्सव किस बात का?’

आज गांधी होते तो वे पूछे बिना नहीं रहते कि जिस रामराज्य के आने पर दीवाली मनानी चाहिए, क्या वह रामराज्य वास्तव में आ गया है? हकीकत है कि रामराज्य तो आया या नहीं, लेकिन ‘राम’ के नाम पर विभाजनकारी राजनीति चरम पर है। बहुत संभावना है कि गांधी होते तो दीपावली पर उपवास रखते और उनकी प्रार्थना-सभा में गरीब के लिए प्रार्थना होती, जिसके घर दीप जलाने के लिए रूई और तेल नहीं है!

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