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जीवन के भाग हैं चार आश्रम

प्राचीन काल से ही सनातन वैदिक संस्कृति में आश्रम की चर्चा है। आश्रम का तात्पर्य है जीवन—भाग। ऋषि—मुनियों ने अपने दिव्य दर्शन और प्रकाश के अनुसार आश्रमों के सिद्धांत एवं व्यवहार की प्रेरणा दी है। वर्ण का सिद्धांत संपूर्ण समाज के लिए था, किंतु आश्रम का सिद्धांत व्यक्ति के लिए। इस नाते आश्रम सिद्धांत एक उत्कृष्ट धारणा थी। आश्रम सिद्धांत बताता था कि व्यक्ति का आध्यात्मिक लक्ष्य क्या है, उसे अपने जीवन को किस प्रकार चलाना है तथा अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति के लिए उसे क्या—क्या तैयारियां करनी है। इसी महान उद्देश्य और धारणा के साथ आश्रम व्यवस्था का सूत्रपात हुआ था। महर्षि आपस्तंब के धर्मसूत्र के अनुसार आश्रम चार हैं — ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। आश्रम शब्द संहिताओं एवं ब्राह्मण—ग्रन्थों में नहीं मिलता। किन्तु इससे यह सिद्ध नहीं होता कि धर्मसूत्रों में पाए जाने वाले जीवन—भाग वैदिक काल में अज्ञात थे। वैदिक काल से लेकर आज तक सनातन धर्म में इन चार आश्रमों की मान्यता है।

प्रथम आश्रम है ब्रह्मचर्य —
ब्रह्मचारी शब्द ऋग्वेद और अथर्ववेद मेें आया है। ब्रह्मचर्य की चर्चा तैत्तिरीयसंहिता, शतपथब्राह्मण तथा अन्य वैदिक ग्रन्थों में हुई है। इसका तात्पर्य अध्ययन से है। बारह वर्ष की आयु में विद्यार्थी वेदादि शास्त्रों का अध्ययन करने के लिए गुरुकुल में प्रवेश करते थे। वे गुरु के आश्रम में शिष्य और अंतेवासी कहलाते थे। वहां उन्हें अनुशासन और संकल्प के साथ रहना पड़ता था। पच्चीस वर्ष तक का जीवन—भाग ब्रह्मचर्य के लिए निर्धारित था। 


गृहस्थ है दूसरा आश्रम —
ऋग्वेद के मत से देवताओं के लिए यज्ञ और संतानोत्पत्ति के लिए गृहस्थ आश्रम है। ऐतरेय—ब्राह्मण के अनुसार स्त्री को ‘जाया’ कहा गया है, क्योंकि पति ही पत्नी के गर्भ से पुत्र के रूप में जन्म लेता है। इसी प्रकार पत्नी पति की अर्धांगिनी है, अत: जब तक व्यक्ति विवाह करके संतानोत्पत्ति नहीं करता, तब तक वह पूर्ण नहीं है। मनुस्मृति के अनुसार पत्नी पर संतान की उत्पत्ति, धार्मिक कृत्य, सेवा, आनंद, अपनी तथा अपने पूर्वजों की स्वर्ग प्राप्ति निर्भर है। पत्नी अपने पति को दो ऋणों से मुक्त करती है — यज्ञ में साथ देकर देव—ऋण से और पुत्रोत्पत्ति कर पितृ—ऋण से। स्पष्ट है कि धर्म—सम्पत्ति, सन्तान और रति, ये तीन विवाह—सम्बन्धी प्रमुख उद्देश्य स्मृतियों एवं निबन्धों ने माने हैं, जो गृहस्थ में ही संभव हैं। विवाह से धार्मिक गुण प्राप्त होने चाहिए, केवल कामुकता की तुष्टि नहीं।

कठोर नियमों से वानप्रस्थ —
वानप्रस्थ के लिए प्राचीन काल में वैखानस शब्द भी था। कालिदास ने ‘शाकुन्तल’ में कण्व ऋषि की पर्णकुटी में रहती हुई शकुन्तला के जीवन को ‘वैखानस—व्रत’ कहा है। मिताक्षरा के अनुसार वानप्रस्थ का तात्पर्य है, वह जो वन में सर्वोत्तम ढंग से (जीवन के कठोर नियमों का पालन करते हुए) रहता है। वानप्रस्थ होने का समय दो प्रकार से होता है। मनुस्मृति के अनुसार जब गृहस्थ अपने शरीर पर झुर्रियां देखे, उसके बाल पक जाएं और जब उसके पुत्रों के पुत्र हो जाएं तो उसे वन की राह पकड़ लेनी चाहिए। कुल्लूक ने 50 वर्ष की अवस्था को वानप्रस्थ के लिए उपयुक्त माना है। वन में पत्नी के साथ या उसे पुत्रों के आश्रय में छोडक़र जाना हो सकता है। वानप्रस्थ को वेदाध्ययन में श्रद्धा रखनी चाहिए और वेद पाठ करना चाहिए। मैथुन त्याग देना चाहिए। 

संन्यास है मोक्ष का मार्ग —

जाबालोपनिषद ने संन्यास को चौथे आश्रम के रूप में ग्रहण किया है। घर, पत्नी, पुत्रों एवं सम्पत्ति का त्याग करके संन्यासी को गांव के बाहर रहना चाहिए और उसे बेघर होना चाहिए। सदा एक स्थान से दूसरे स्थान के लिए चलते रहना चाहिए। मनु के अनुसार संन्यासी केवल वर्षा में एक स्थान पर ठहर सकता है। पर मिताक्षरा से पता चलता है कि संन्यासी वर्षा ऋतु में एक स्थान पर केवल दो मास तक ही रुक सकता है। वह आषाढ की पूर्णिमा से लेकर वर्षा ऋतु में एक स्थान पर रुक सकता है। यदि संन्यासी चाहे तो गंगा के तट पर सदा रह सकता है। पर कौटिल्य ने यह भी लिखा है कि जो व्यक्ति बिना बच्चों एवं पत्नी के प्रबन्ध किए संन्यासी हो जाता है, उसे दण्ड मिलता है।

संन्यासी को सदा अकेले घूमना चाहिए, नहीं तो मोह एवं बिछोह से वह पीडि़त हो सकता है। वास्तविक संन्यासी अकेला ही रहता है, जब दो होते हैं तो दोनों का एक जोड़ा हो जाता है। जब तीन एकसाथ हैं तो वे ग्राम के समान हैं और जब तीन से अधिक एकसाथ रहते हैं तो वे नगर के समान हो जाते हैं। संन्यासी को जोड़ा, ग्राम एवं नगर नहीं बनाना चाहिए, नहीं तो वैसा करने पर वह धर्मच्युत हो जाएगा। संन्यासी के लोगों के साथ रहने से लोकवार्ता होने लगती है और अत्यधिक सान्निध्य से स्नेह, ईष्र्या, दुष्टता आदि मनोभावों की उत्पत्ति हो जाती है। कुतपस्वी लोग बहुत से कामों में संलग्न हो जाते हैं, यथा — धन—सम्पत्ति या आदर प्राप्ति के लिए व्याख्यान देकर शिष्यों को एकत्र करना। तपस्वियों के लिए चार प्रकार की क्रियाएं हैं — ध्यान, शौच, भिक्षा एवं एकान्तशीलता।
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