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उलझनों को सुलझाती है गीता

-शास्त्री कोसलेंद्रदास
 
चेतना का उजियाला फैलाती गीता ऐसा अमर ग्रंथ है, जिसकी जयंती मनाने की परंपरा पुरातन काल से चली आ रही है। गीता का जन्म कुरुक्षेत्र में पवित्र मार्गशीर्ष मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी को हुआ था। युद्ध से पलायन करके शरण में आए अर्जुन पर वात्सल्य से विवश होकर सर्वेश्वर श्रीकृष्ण ने गीता के रूप में अध्यात्म शास्त्र का उपदेश किया, जो किसी काल, धर्म या संप्रदाय के लिए नहीं, अपितु संपूर्ण मानव जाति के लिए है। इस लघुकाय ग्रंथ में ज्ञान का उपदेश है, जो संपूर्ण मानव जाति को सचेत करता है। 
 

उपनिषदों का सार गीता
गीता महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत का हिस्सा है, जिसका इतिहास पांच हजार वर्ष पुराना है। रामायण और महाभारत प्राचीन भारत के ऐतिहासिक दस्तावेज ही नहीं बल्कि हमारे धर्मग्रंथ भी हैं। ये दोनों ग्रंथ आत्म—तत्त्व का ज्ञान कराते हैं। प्रत्येक मनुष्य की देह के भीतर क्या चल रहा है, ये अमर ग्रंथ इसकी तस्वीर खींचते हैं। इन ग्रंथों में देव भाव के प्रतिनिधि श्रीराम और असुर भाव के नायक रावण के बीच हर रोज चलने वाली लड़ाई का लेखा—जोखा है। इसी धारा में कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हुआ संवाद गीता है। गीता शब्द का मतलब है, प्रेमपूर्वक बोला गया। इस प्रकार गीता का अर्थ है — श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया आत्म बोध, जिसमें सारे वेदांत-उपनिषदों का सार है। अठारह अध्यायों में बंटी गीता की शुरूआत पुत्रमोह में पड़े धृतराष्ट्र ने की है, जो केवल नेत्रों से ही नहीं बल्कि सर्वात्मना अंध है। 


पूछने-समझने की प्रक्रिया गीता

गीता का अध्ययन, मनन और चितंन मानव मन को चमत्कृत करता है। उसका अध्ययन इसलिए करना चाहिए क्योंकि हमारी देह में अंतर्यामी श्रीकृष्ण विराजमान हैं और हम आपत्काल में उनसे सवाल—जवाब पूछ सकते हैं। गीता की जरूरत इसीलिए है कि वहां जीवन की उलझनों को सुलझाने के उत्तर ढूंढ़े जा सकें । इस नाते पूछने और समझने की प्रक्रिया ही गीता कहलाती है। हम भले सोए हैं पर वह अंतर्यामी परमात्मा सदा जागृत हैं। वह भीतर बैठकर देखता है कि हम में कब जिज्ञासा उत्पन्न हो? पर हमें सवाल पूछना नहीं आता। सवाल पूछने की मन में भी नहीं उठती। जब अंतर्मन में श्रेष्ठ जिज्ञासाएं उत्पन्न होती हैं तो हमें गीता की आवश्यकता पड़ती है। इस कारण हमें गीता-सरीखी पुस्तक का नित्य अध्ययन करना चाहिए। हम सवाल पूछना सीखना चाहते हैं या जब मुसीबत में पड़ते हैं तो मुसीबत दूर करने के लिए गीता की शरण में जाते हैं और उससे आश्वासन लेते हैं, इस दृष्टि से भी गीता पढऩी चाहिए।

समस्याओं का समाधान गीता

गीता गुरु है, माता है। उसकी गोद में सिर रखकर संतान सही-सलामत पार हो जाती है। गीता के द्वारा अपनी सारी धार्मिक गुत्थियां सुलझा लेंगे। इस भांति गीता का नित्य मनन करनेवालों को उसमें से नित्य नए अर्थ मिलते हैं। धर्म और समाज की ऐसी एक भी उलझन नहीं है, जिसे गीता न सुलझा सकती हो। हमारी अल्पश्रद्धा के कारण हमें उसका पढऩा-समझना न आए तो दूसरी बात है, पर हमें श्रद्धा नित्य बढ़ाए जाने और स्वयं को सावधान रखने के लिए गीता का पारायण करते रहना चाहिए। मानव जीवन ज्ञान, कर्म और भक्ति का समन्वय है। गीता इनसे संबंधित सभी समस्याओं का समाधान है। गीता का अध्ययन जीवन के गूढ़ रहस्य को उजागर करता है। 

प्रस्थानत्रयी में गीता

भारतीय दर्शन की पंरपरा में गीता का स्थान अनुपम है। वह प्रस्थान-त्रयी में एक है। प्रस्थान-त्रयी का तात्पर्य है – उपनिषद, महर्षि बादरायण के लिखे ब्रह्मसूत्र और गीता। इस कारण पिछली शताब्दियों में आचार्यों ने गीता पर दार्शनिक सिद्धांतों के अनुरूप भाष्य लिखे। शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्काचार्य, वल्लभाचार्य और रामानंदाचार्य सहित सैंकड़ों मनीषियों ने गीता पर भाष्य लिखे हैं। इन आचार्यों के विभिन्न अभिमतों के अनुसार कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग मोक्ष देते हैं, जिनका विवेचन गीता में है। वेद—विज्ञान सिद्धांत के प्रतिष्ठापक पंडित मधुसूदन ओझा ने गीता का प्रतिपाद्य बुद्धियोग माना है। स्पष्ट है, गीता में वह सब है जिसकी मानव समुदाय को आवश्यकता है। 

गीता और महात्मा गांधी

महात्मा गांधी ने गीता को शास्त्रों का दोहन माना। उन्होंने अपनी रचना ‘गीता माता’ में श्लोकों के शब्दों को सरल अर्थ देते हुए उनकी टीका की है। ‘गीता-माता’ में महात्मा गांधी ने लिखा, ‘गीता शास्त्रों का दोहन है। मैंने कहीं पढ़ा था कि सारे उपनिषदों का निचोड़ उसके सात सौ श्लोकों में आ जाता है। इसलिए मैंने निश्चय किया कि कुछ न हो सके तो भी गीता का ज्ञान प्राप्त कर लें। आज गीता मेरे लिए केवल बाइबिल नहीं है, केवल कुरान नहीं है, मेरे लिए वह माता हो गई है। मुझे जन्म देने वाली माता तो चली गई, पर संकट के समय गीता-माता के पास जाना मैं सीख गया हूं। मैंने देखा है, जो कोई इस माता की शरण जाता है, उसे वह ज्ञानामृत से तृप्त करती है।’ 

गांधीजी लिखते हैं, कुछ लोग कहते हैं कि गीता तो महागूढ़-ग्रंथ है। स्वर्गीय लोकमान्य तिलक ने अनेक ग्रंथों का मनन करके पंडित की दृष्टि से उसका अभ्यास किया और उसके गूढ़ अर्थों को वे प्रकाश में लाए। उस पर ‘गीता—रहस्य’ की रचना की। तिलक महाराज के लिए यह गूढ़ ग्रंथ था पर हमारे जैसे साधारण मनुष्य के लिए यह गूढ़ नहीं है। सारी गीता का वाचन आपको कठिन मालूम हो तो भी आप केवल पहले तीन अध्याय पढ़ लें। गीता का सार इन तीन अध्यायों में आ जाता है। बाकी के अध्यायों में वही बात अधिक विस्तार से और अनेक दृष्टियों से सिद्ध की गई है। यह भी किसी को कठिन मालूम हो तो इन तीन अध्यायों में से कुछ श्लोक छांटे जा सकते हैं, जिनमें गीता का निचोड़ आ जाता है। तीन जगहों पर तो गीता में यह आता है कि सब धर्मों को छोडक़र तू केवल मेरी शरण ले। इससे अधिक सरल—सादा उपदेश और क्या हो सकता है? जो मनुष्य गीता से अपने लिए आश्वासन प्राप्त करना चाहे तो उसे उसमें से वह पूरा-पूरा मिल जाता है। जो मनुष्य गीता का भक्त होता है, उसके लिए निराशा की कोई जगह नहीं है, वह हमेशा आनंद में रहता है।
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