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‘रुरल वर्क फ़्रोम होम’ मॉडल ‘करो ना काम कोरोंना नाकाम’

इनके स्वाभिमान की अनोखी जिद से हार रहा कोरोना

सिरोही के ग्रामीणों एवं वनवसियों ने किया राशन-किट लेने से मना, कुछ काम करके ही राशन लेने की जिद अड़े, कुछ ने काम मिलने पर राशन वापस दिए जाने को शर्त पर स्वीकार किया राशन

दुनियाभर के लोग कोरोना महामारी से जूझ रहे हैं। देश और दुनिया में लॉकडाउन के चलते लोगों के सामने दो वक्त के भोजन तक का संकट खड़ा हो गया है। इसके मद्देनजर सरकार और स्वयंसेवी संस्थाओं ने जरूरतमंदों तक अनाज पहुंचाने का बीड़ा उठाया है। लेकिन सिरोही के वनवासी अंचल के लोग स्वयंसेवी संस्था की ओर से बांटा जा रहा राशन नहीं ले रहे। दरअसल, बात यह नहीं है कि वे जरूरतमंद नहीं हैं लेकिन बरसों से चली आ रही स्वाभिमान की परंपरा को ये मरते दम न छोड़ने की जिद पर अड़े हैं। जिद ऐसी कि स्वयंसेवी संस्था से काम करवाने का वादा लेकर ही राशन ले रहे।
ग्रामीणों के ज़स्बे से प्रभावित हो कर स्वयंसेवी संस्था ‘मैं भारत’ जो पहले से ही ‘ग्राम स्वावलम्बन’ के लिए काम कर रही है ने कोरोंना महामारी के दौरान तैयार किया ‘ग्रामीण वर्क फ़्रोम होम मॉडल, इस मुहिम को संस्था ने नाम दिया है, ‘ करो काम, कोरोंना नाकाम’।

संस्था ने ग्रामीणों की काम करने की ज़िद्द पर उन्हें शहरी क्षेत्र में लाकडाउन के कारण आवारा और लगभग बेसहारा हो चुके गायों व कुत्तों के लिए रोटियां बनाने का काम सौंपा। इस काम को ग्रामीणों एवं वनवासियों ने हाथों-हाथ लिया और ऐसा करके उन्होंने खुद के राशन का प्रबंध तो किया ही, शहरी इलाक़े में आवारा जीवों की जिंदगी बचाने में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। इसके साथ संस्था द्वारा ग्रामीणों एवं आदिवासियों को वीसी के माध्यम से विभिन्न काम जैसे मास्क बनाना, फ़ेसशील्ड असेम्बल करना, थैले बनाना, कोरोंना काल में जनता को जागरूक करने के लिए हस्तलिखित जागरूकता पोस्टर तथा कोरोंना से जूझ रहे कोरोंना वॉरीअर के लिए मोमेंटो शील्ड्ज़ एवं सर्टिफ़िकट्स बनाने का काम सौंपा है। ग्रामीण अपने घरों से इन कामों को अंजाम दे रहे है जिसके बदले में संस्था द्वारा उन्हें राशन अथवा राशि का भुगतान किया जा रहा है।

आदिवासियों का हर घर यूं लगता है जैसे कोरोना को हराने की जिद पर अड़ा है। फिलहाल, हर घर से रोजाना तकरीबन सौ रोटियां बेसहारा जानवरों के लिए बनाई जा रही हैं। साथ ही क़रीब 300 मास्क, 100 फ़ेसशील्ड एवं इतने ही पोस्टर एवं मोमेंटो बनाए जा रहे है। संस्था इन्हें इस काम की सामग्री यानी गेहूं, बाजरा व मक्का का आटा व गुड़ ड्रॉइंग शीट, कलर्ज़ एवं अन्य कच्चा माल उपलब्ध करवा रही है।
ग्रामीणों की इस सकारात्मक सोच को आगे लाने के लिए इसे एक मुहिम में तब्दील किया गया है, जिसका सूत्र-वाक्य है- ‘करो ना काम, कोरोना नाकाम।’
यही नहीं, जिले के मिंगलवा फली और होक्कफली गांवों के लोगों ने मुफ्त में राशन स्वीकार नहीं कर रहे। ग्रामीणों के मुताबिक उन्हें दया नहीं चाहिए, वे इसे काम कर वापस लौटने के तौर पर ले रहे हैं। उन्होंने संस्था से वादा किया है कि लॉकडाउन खुलने के बाद अपनी मजदूरी में से वे इस राशन को चुकाएंगे। संस्था के पदाधिकारी रजनीकांत सोलंकी बताया कि ऐसे वनवासियों एवं ग्रामीणों ने स्थानीय भाषा में ‘चोपड़ा’ कहे जाने वाले रजिस्टर में बाकायदा अपने नाम भी रिकॉर्ड के लिए लिखवाए हैं। ताकि वे इस कठिन समय में लिया गया ‘राशन’ किसी अन्य ज़रूरतमंद को दिए जाने के लिए वापस चुका सकें या किसी गरीब को दे कर इस क़र्ज़ को चुका सकें।

संस्था की पहल अनूठी, प्रशासन ने किया मदद का वायदा

‘मैं भारत’ संस्था की ‘करो ना काम, कोरोना नाकाम’ वाकई एक अनूठी पहल है जिसने इस दौर में भी लोगों के स्वाभिमान को उजागर किया है। मैंने ग्रामीण आजीविका मिशन को भी सभी आवश्यक जानकारी संस्था को मुहैया कराने का निर्देश दिया है।’
भगवती प्रसाद, ज़िला कलेक्टर, सिरोही।

ज़िला कलेक्टर द्वारा संस्था के साथ काम करने के लिए ज़िला परिषद को लिखा गया है परंतु ज़िला परिषद ने अब तक संस्था के काम में कोई रुचि नहीं दिखाई है।

स्वाभिमान बड़ा है, भूख नहीं

सिरोही के वासा गांव के 27 वर्षीय कसना राम की लॉकडाउन के चलते अहमदाबाद में कुक की नौकरी छूट गई। नौ लोगों के परिवार के सामने खाने का संकट खड़ा हो गया था। ऐसे में उन्होंने बेसहारा जानवरों के लिए रोटियां बनाने काम करना शुरू किया। अब संस्था के साथ जुड़ कर आसपास के कई गावों में लोगों को रोटियाँ, मास्क आदि बनवाने का काम करवा रहे है जिसके बदले में लोगों को राशन एवं राशि दी जा रही है।

…ताकि पेट भरे और स्वाभिमान भी न मरे

संस्था ‘मैं भारत’ के अध्यक्ष रितेश शर्मा बताते हैं- संस्था ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक सवाबलंबन के लिए पिछले 10 वर्षों से शहरों में बसे ग्रामीणों को गाँव के विकास में भागीदार बनाने के लिए ‘आओ गाँव चले’ मुहिम चला रखी है जिसके सार्थक परिणाम सामने आए है। हमारे प्रयास रहे है की ग्रामीणों को गावों में ही रोज़गार मिले सभी आवश्यक वस्तुओं का उत्पाद एवं सुविधाए ग्रामीण क्षेत्रों में ही सम्भव हो पाए। गाँव आर्थिक रूप से सक्षम बने और शहरी पलायन को पर रोक लगे। इसके लिए हम विभिन्न ज़िलों में पहले से ही ग्रामीण टुरिज़म, डेरी, माइक्रो ग्रीन्स आदि पर काम कर रहे थे।
जब हमें ग्रामीणों ने काम के बिना राशन न लेने की बात कही तो संस्था ने इन गांवों में कोरोंना काल में तुरंत राहत के लिए एक ‘ग्रामीण वर्क फ़्रोम होम’ आर्थिक मॉडल तैयार किया।

हम मास्क के लिए कपड़ा तथा रोटियों के लिए अनाज एवं अन्य सामान भी गांवों से ही खरीद रहे हैं जिसे हाथ चक्की व बिजली की छोटी चक्कियों से पिसवा रहे हैं जिससे गाँव में कई लोगों को आर्थिक उपार्जन हो रहा है। पिसा हुआ आटा व अन्य सामग्री काम करने के इच्छुक परिवारों को दी जा रही है ताकि वे जानवरों के लिए रोटियां बना सकें। इन रोटियों को सिरोही व आबू के शहरी इलाकों में जानवरों के लिए भिजवाया जा रहा है। हमारा ये मॉडल सफल रहा है, अब अन्य गांवों में भी ये शुरू किया गया है।

मास्क भी बना रहीं आदिवासी महिलाएं ग्रामीण कर रहे चित्रकारी एवं लिख रहे प्रमाणपत्र।

मैं भारत संस्था के सचिव अश्वनी धानावत के मुताबिक सिलाई का काम जानने वाली ग्रामीण महिलाओं को विडीओ कोनफेरेंसिंग़ के माध्यम से मास्क एवं शिलड बनाना सीखाया गया है। अब महिलाएँ सिलाई मशीन एवं हाथ सिलाई से मास्क तैयार कर रही हैं एवं फ़ेस शील्ड असेम्बल कर रही है। ये मास्क एवं फ़ेसशील्ड कोरोंना से लोहा ले रहे डॉक्टर, स्वास्थ कर्मी, पुलिस, प्रशासन एवं जरूरतमंदों को मुफ्त मुहैया करवाए जा रहे है। तथा कोरोंना जागरूकता पोस्टर्स प्रमुख स्थानो, सरकारी कार्यालयों, सब्ज़ी दूध एवं मेडिकल की दुकानों पर लोगों को कोरोंना से बचाव के लिए जागरूक करने हेतु लगाए गए है

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