Education

शिक्षा से जुड़ी है दीक्षा

विद्या का उपयोग ज्ञान के विस्तार के लिए हो, न कि विवाद करने के लिए। विद्या कल्याण का मार्ग बने, पतन का नहीं। इन गहरे तत्वों का विचार करके ही ऋषियों ने शिक्षा की समाप्ति पर दीक्षा देने का समारोह प्रारंभ किया, जो गुरुकुलों में सदा से चला आ रहा है। यह समारोह आज भी विश्वविद्यालयों आयोजित होते देखा जा सकता है।

-शास्त्री कोसलेंद्रदास

पुरातन काल से शिक्षा की समाप्ति पर दीक्षा देने की सुदीर्घ वैदिक परंपरा है। शिक्षा का अर्थ अभ्यास है। ज्ञान पाने के लिए किया गया निरंतर प्रयत्न शिक्षा है। गुरुकुलों में जब वेदों का अध्ययन करवाया जाता था, तब उनके छह अंग भी पढ़ाए जाते थे। इन छह शास्त्रों में एक शिक्षा है, जिसका स्थान सबसे पहला है। अ, इ, उ इत्यादि वर्णों के सही उच्चारण करने की विद्या शिक्षा कही जाती है। शिक्षा का अर्थ विद्या प्राप्त करना है। इसे पाकर ही मानव पशुत्व से मुक्त होता है। प्राचीन ग्रंथों में स्पष्ट लिखा है — विद्याविहीन: पशु: यानी विद्या से हीन मानव पशु के समान है। इस कारण शिक्षा पाना मनुष्य के लिए न केवल जरूरी है बल्कि इससे ही वह हित और अहित जान पाता है।

शिक्षा और दीक्षा का नाता
शिक्षा पाने के बाद मानव अधीत विद्या का उपयोग केवल अपने लिए न करे, बल्कि उससे समाज और देश को लाभान्वित करे, इसलिए शिक्षा के साथ दीक्षा का सनातन संबंध है। शिक्षा से मानवता के विकास और परस्पर मैत्री के भाव का संवर्धन जरूरी है। विद्या का उपयोग ज्ञान के विस्तार के लिए हो, न कि विवाद करने के लिए। विद्या कल्याण का मार्ग बने, पतन का नहीं। इन गहरे तत्वों का विचार करके ही ऋषियों ने शिक्षा की समाप्ति पर दीक्षा देने का समारोह प्रारंभ किया, जो गुरुकुलों में सदा से चला आ रहा है। यह समारोह आज भी विश्वविद्यालयों आयोजित होते देखा जा सकता है।

दीक्षांत के सूत्र 
मनुष्य का जीवन चार आश्रमों में बंटा है। इनमें पहले ब्रह्मचर्य आश्रम में विभिन्न विषयों को जानने का अभ्यास मानव के शेष जीवन का आधार है। विद्यार्थी अवस्था में किया अध्ययन मानव को सोचने-विचारने योग्य बनाता है। यही प्रारंभिक और उच्च शिक्षा मानव को समाज और राष्ट्र के लिए प्रेरक तथा वरदायी बना सके, इस नाते उसे अध्ययन करवाने वाले आचार्य शिक्षा के अंत में दीक्षा से अनिवार्य रूप से जोड़ते हैं। ‘तैत्तिरीय उपनिषद’ में दीक्षांत समारोह के सूत्र हैं। ये सूत्र सत्य के आचरण से जुड़े हैं। गुरु अपने शिष्य को गृहस्थ आश्रम में जाने की अनुमति देने के साथ ही समाज के प्रति कर्तव्यों का निर्धारण करता है।

ज्ञान के आधार हैं वेद
भारतीय ज्ञान परंपरा के आधार वेद हैं। वेद उन ग्रंथों को कहते हैं, जो सार्वकालिक एवं सार्वभौम ज्ञाननिधि हैं। वेद चार हैं — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। महर्षि पतंजलि के ‘महाभाष्य’ के अनुसार ऋग्वेद की 21, यजुर्वेद की 101, सामवेद की 1000 और अथर्ववेद की 9 शाखाएं थी। इन वेदों के चार प्रकार हैं — संहिता, आरण्यक, ब्राह्मण और उपनिषद।

उपनिषद शब्द का अर्थ है निकट बैठना। गुरु द्वारा अपने निकट बिठाकर शिष्य को किया तात्विक विवेचन उपनिषद है। उपनिषद परम्परा में शिष्य की तत्वज्ञान संबंधी जिज्ञासा का समाधान ऐसे गुरु करते हैं, जिन्होंने स्वयं अमूर्त तत्त्व का साक्षात्कार किया हो।

गुरु और शिष्य परंपरा
संसार में ज्ञान के समान पवित्र कोई दूसरा पदार्थ नहीं है। ज्ञान ही अज्ञान को हटाकर परम तत्त्व की प्राप्ति करवाने में सहायक है। ज्ञान प्राप्ति की इस प्रक्रिया में गुरु और शिष्य परंपरा का अभूतपूर्व महत्व है। गुरु-शिष्य परम्परा ही आदिकाल से ज्ञानसंपदा का संरक्षण कर उसे ‘श्रुति’ के रूप में क्रमबद्ध करती आई है।

गुरु हो श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ
गुरु व शिष्य के परस्पर संबंध एवं समर्पण भाव द्वारा अपने ‘स्वत्व’ के स्थान पर परमात्मा को देखने का अलौकिक कार्य उपासना है। गुरु कैसा हो, वेद कहते हैं — ब्रह्मनिष्ठं श्रोत्रियं गुरुमाश्रयेत्। गुरु का श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ होना नितांत आवश्यक है। श्रोत्रिय शब्द का अर्थ है — श्रुतवेदांत यानी शास्त्रों का अध्ययन करने वाला आचार्य। ब्रह्मनिष्ठ से तात्पर्य परमात्मा में निरंतर चित्त लगाने वाला। ये दोनों योग्यताएं एक होने पर भी गुरु शब्द से नहीं कही जा सकती। क्योंकि केवल श्रोत्रिय होने से उसके जीवन में भटकाव की संभावना बनी रहती है। ठीक ऐसे ही केवल ब्रह्मनिष्ठ होने से वह अपने शिष्य को तत्व का प्रवचन करने में असमर्थ होगा। इस नाते श्रेष्ठ आचार्य के लिए श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ, दोनों होना जरूरी है।

संत ज्ञानेश्वर ने ‘ज्ञानेश्वरी’ में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन पर की गई कृपा में गुरु का स्वरूप बताया है। वे लिखते हैं, ‘भक्तशिरोमणि अर्जुन को उन्होंने अपना सुवर्ण—कंकणविभूषित दक्षिण बाहु फैलाकर हृदय से लगा लिया। हृदय एक हो गए। इस हृदय में जो था, वह कृष्ण ने अर्जुन के हृदय में डाल दिया। अर्जुन को शरणागति प्रदान की।’

चेतना के मर्मज्ञ हैं गुरु
गुरु-शिष्य संबंध आध्यात्मिक है, जिनमें ज्ञान और चरित्र का उच्चस्तरीय आदान-प्रदान होता है। संबंध शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आत्मिक होते हैं। पहले तीन संबंध तो किसी से भी हो सकते हैं किन्तु आत्मिक संबंधों की संभावना सिर्फ गुरु से है।

शिष्य के लिए यह आवश्यक है कि वह समिधा अर्थात यज्ञ-काष्ठ जैसी पात्रता लेकर गुरु की शरण में जाए। गुरु चेतना के मर्मज्ञ होते हैं। वह शिष्य की चेतना में सकारात्मक परिवर्तन करने में समर्थ हैं । गुरु का हर आघात शिष्य के अहंकार पर होता है तथा वे प्रयास करते हैं कि शिक्षण द्वारा वह शिष्य के मन को निर्मल बना दे।

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