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सांप्रदायिकता से मुक्त संस्कृत

संस्कृत के सार्वभौम स्वरूप को समाज के सामने लाने की जरूरत है क्योंकि संस्कृत में ही वह अपार शक्ति है, जिससे सर्वधर्म समभाव की परिकल्पना साकार हो सकती है।

-शास्त्री कोसलेंद्रदास 

विगत दिनों बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में एक मुस्लिम युवक के सहायक आचार्य बनने की चर्चा जोरों पर है। इस नियुक्ति के पक्ष और विपक्ष में तमाम बातें कही जा रही हैं। भिन्न—भिन्न तर्कों के साथ इस नियुक्ति पर सवाल—जवाब चल रहे हैं। बाबा विश्वनाथ की नगरी वाराणसी से उठा यह अकादमिक मामला धार्मिक मान्यता से जुड़ गया।

संस्कृत शिक्षक के रूप में डॉ. फिरोज की नियुक्ति पर लोग सवाल उठा रहे हैं, जो भाषा की बजाय मजहब से ज्यादा जुड़े हैं। इससे एक गफलत पैदा हुई है कि संस्कृत और हिंदू धर्म, परस्पर एक ही हैं या दो भिन्न—भिन्न धाराएं? क्या काई मुसलमान सबसे पुरातन भाषा संस्कृत पढ़—लिख सकता है? यदि हां तो भी वेद, पुराण और शास्त्रों की भाषा संस्कृत कोई ‘गैर—हिंदू’ कैसे पढ़ा सकता है? क्या संस्कृत विभागों में वैदिक मंत्रों की जगह कुरान की आयतें गूँजेंगी?

इस परिप्रेक्ष्य यह जानने योग्य तथ्य है कि एक शताब्दी पहले बीएचयू में संस्कृत महाविद्यालय 1918 में खोला गया। बाद में यह प्राच्य विद्या—धर्म विज्ञान संकाय हो गया। अभी इसका नाम संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय है। यह केंद्र सनातन शास्त्रों, संस्कृत भाषा और संस्कृत में लिखे साहित्य के प्रचार एवं प्रसार के लिए अनवरत काम कर रहा है। इस संकाय के अंतर्गत वेद, व्याकरण, साहित्य, ज्योतिष, वैदिक दर्शन, जैन—बौद्ध दर्शन, धर्मशास्त्र—मीमांसा एवं धर्मागम विभाग हैं। इन आठ विभागों में से जिस विभाग में डॉ. फिरोज की नियुक्ति हुई है, वह साहित्य विभाग है।

यहां साहित्य से तात्पर्य संस्कृत में लिखे उन प्राचीन काव्य—ग्रंथों से हैं, जिन्हें विगत सहस्राब्दियों में लिखा गया। इस परंपरा में कालिदास, भवभूति, दंडी और बाणभट्ट जैसे कई अमर नाम हैं। साहित्य विभाग में हिंदू धर्म के कर्मकांड और धार्मिक रीति—रिवाजों का अध्ययन न के बराबर होता है। रामायण और महाभारत के साथ भरत मुनि के ‘नाट्य शास्त्र’ का पठन—पाठन इस विभाग का केंद्र है। ऐसे में यक्ष प्रश्न है कि क्या संस्कृत भाषा में लिखे साहित्य के ग्रंथ किसी धर्म और परंपरा के दायरे तक सीमित हैं? क्या वे किसी समुदाय विशेष या भौगोलिक सीमाओं की बेड़ियों से बंधे हैं? यदि ऐसा है तो पिछली 5 शताब्दियों में अनेक गैर—हिंदुओं के लिखे उन संस्कृत काव्यों को किस श्रेणी में रखा जाए, जिन्हें ईसाइयों और मुसलमानों ने लिखा है?

संस्कृत के विकास में मुसलमानों व ईसाइयों का बड़ा योगदान है। 2005 में प्रकाशित आचार्य सत्यव्रत शास्त्री के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘डिस्कवरी ऑफ संस्कृत ट्रेजर्स’ में ‘कंट्रीब्यूशन ऑफ मुस्लिम्स टू संस्कृत’ विषय पर सुदीर्घ विवेचन है। इसी क्रम में ‘क्रिश्चियन लिट्रेचर इन संस्कृत’ भी इस पुस्तक में शामिल है। ईसाइयों ने तो श्रीमद्भगवद्गीता की तर्ज पर ‘ख्रिस्तु गीता’ का प्रणयन किया। केरल के पीसी देवस्सिआ ने 36 सर्गों में एक सुंदर व ललित संस्कृत महाकाव्य लिखा ‘ख्रिस्तुभागवतम्’, जिस पर उन्हें 1980 में साहित्य अकादमी से संस्कृत का पुरस्कार मिला। इसी तरह यीशुचरितम्, यीशुमाहात्म्यम् और यीशुसौरभम् जैसे अनेक ग्रंथ लिखे जा चुके हैं। यहां तक की ‘विष्णु—सहस्रनाम—स्तोत्र’ की तरह ‘ख्रिस्तु—सहस्रनाम—स्तोत्र’ भी ईसाइयों द्वारा लिखा गया है। उल्लेखनीय है कि तिरुपति के राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ में एक मुस्लिम प्राध्यापक ने संस्कृत व्याकरण के जटिल ग्रंथ ‘माधवीय—धातुवृत्ति:’ पर महत्वपूर्ण कार्य किया है।

प्राचीन काल से मुस्लिम विद्वानों ने संस्कृत पर लेखनी चलाई है। अब्दुल रहीम खानेखाना ने सोलहवीें शताब्दी में ‘खेटकौतुकम्’ व ‘रहीमकाव्यम्’ जैसे अमर संस्कृत ग्रंथ लिखे। बादशाह शाहजहां और बेगम मुमताज के दरबार में जगन्नाथ त्रिशूली नामक विद्वान पंडित थे। बादशाह अकबर ने 1582 ईस्वी में महाभारत का फारसी अनुवाद ‘रज्मनामा’ नाम से करवाया, जो आज भी जयपुर के सिटी पैलेस में सुरक्षित है। आज भी अनेक मुस्लिम संस्कृत विद्वान् हैं, जो निरंतर संस्कृत लेखन से जुड़े हैं।

भाषा का किसी धर्म से संबंध नहीं होता। संस्कृत भी किसी धर्म विशेष से जुड़ी हुई नहीं रही और न ही इसे जुडऩा चाहिए। भाषा का कोई सांप्रदायिक चरित्र नहीं होता। उसे सांप्रदायिकता के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। भाषा के प्रति धर्मनिरपेक्ष दृष्टि रखनी चाहिए। यही कारण रहा था कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय जब मोहमडन एंग्लो ऑरियंटल कॉलेज (एमएओ) के रूप में 1875 ईस्वी में शुरू हुआ तो वहां स्कूल और कॉलेज, दोनों स्तर पर संस्कृत भाषा की पढ़ाई शुरू की गई थी। पंडित रामस्वरूप शास्त्री अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पहले संस्कृत व्याख्याता नियुक्त हुए। उनके बाद भी वहां अनेक संस्कृत विद्वानों का चयन किया गया, जो कि जाति और धर्म से ऊपर था।

गौरतलब है कि 11 सितंबर 1949 को हुई राष्ट्रभाषा खोज समिति की बैठक में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के संस्कृत को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने के सुझाव का साथ प्रो. नाजिरुद्दीन अहमद ने दिया था। बंगाल से निर्वाचित मुस्लिम लीग के नेता नाजिरुद्दीन अहमद के जेहन में इसके पीछे यह पवित्र मंशा थी कि स्वतंत्र भारत का भाषाई आधार पर कहीं फिर से बंटवारा न हो जाए। इसलिए भारत की राष्ट्रभाषा संस्कृत बननी चाहिए।

संस्कृत को किसी धर्म, जाति, वर्ग तथा संप्रदाय से नहीं बांधा जा सकता। उसका किसी से कोई विरोध नहीं है। वह ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ की बात करने वाली सनातन भाषा है। फिर उसे सिर्फ हिंदुओं तक सीमित किया जाना कहां तक उचित है? संस्कृत को किसी भी धर्म, संप्रदाय अथवा जाति विशेष से संबद्ध करना पूरी तरह से निराधार है। मौजूदा दौर में संस्कृत विभागों और संस्कृत विश्वविद्यालयों में अनेक मुस्लिम विद्यार्थी संस्कृत पढ़-लिख रहे हैं। सुख्यात अधिवक्ता तनवीर अहमद एक दिलखुश टिप्पणी करते हैं, ‘संस्कृत बंधनों से मुक्त आकाश की तरह है। यह एक भाषा तो है ही साथ में जीवित परंपरा भी है। सुकून मिलता है कि मुसलमानों के बच्चे संस्कृत पढ़ रहे हैं।’

भारत में एक महान सभ्यता रही है। संस्कृत उसकी वाहक है। उसमें धर्म, दर्शन और विज्ञान का मेल है। वहां ‘धर्म’ शब्द का प्रयोग साध्य और साधन, दोनों रूपों में मिलता है। लेकिन पद्धति कभी मंजिल नहीं होती। पद्धति की कट्टरताएं टकराव पैदा करती हैं। इस टकराव का सबसे बड़ा समाधान संस्कृत के पास है, क्योंकि उसका यह सिद्धांत ही है, ‘आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्’ अर्थात जो तुम्हें अपने लिए ठीक न लगे, उसे दूसरों के लिए न भी करो। संस्कृत में छिपे मूल्य इस परिमाण में आंके जा सकते हैं, जिनकी जरूरत आज हरेक राष्ट्र, समाज, धर्म, पंथ, परंपरा और भाषा को है। ऐसे में, डॉ. फिरोज का बीएचयू में संस्कृत साहित्य विभाग में आचार्य पद पर चयन को खुले मन से स्वीकार करने की जरूरत है, जिससे संस्कृत का सार्वभौम स्वरूप समाज के सामने आए। संस्कृत में ही वह अपार शक्ति है, जिससे सर्वधर्म समभाव की परिकल्पना साकार हो सकेगी।

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