
होली की रंगत आ तो जाती है माघ के बीतते ही में ही पर पूरी तरह से व्यक्त होती है ‘उत्तरा फाल्गुनी’ नाम-संकेत को वहन करने वाली फाल्गूनी पूर्णिमा पर। फाल्गुनी पूर्णिमा पर ही वसंत या मधु ऋतु, जो भी कहें, पूर्ण अभिव्यक्ति पाती है। यह वसंत प्रकट होती है अनाज के मीठे दानों में, आम की गदराई मंजरियों में, खिल उठी हरी घास में, रात-बिरात कूकती कोयल में और मधु बरसाती सुरम्य चांदनी रात में। मनुष्य जीवन के चार पुरुषाथें में होली ‘काम’ से जुड़ी है। इसी कारण होली मानव मन में छिपे ‘रति-काम’ को प्रकट करने का समय है।
परंपरा में होली ऋषि और कृषि का उत्सव है। वैदिक काल से आज तक होली ऋषियों और कृषकों द्वारा मनाई जाती रही है। आश्रमों में ब्रह्मचारी फाल्गुनी पूर्णिमा को ‘सामवेद’ के मंत्रों का गान करते थे। सामवेद से जुड़े ‘ताण्ड्यमहाब्राह्मण’ के इन मंत्रों का सीधा संबंध होली से है – गावो हाऽऽरे सुरभय इदम्मधु। गावो घृतस्य मातर इदम्मधु।।
एक ओर जहां गुरुकुलों में होली पर ‘हुताशनी’ अनुष्ठान होता है, वहीं नई फसल के पक जाने पर किसान रंग-बिरंगी होली खेलते हैं। परंपरा ने होली को ‘अग्नि’ से मिलाया। भला, धरती पर उपजे नए धान्य को ऐसे थोड़े ही खाना है? जौ-गेहूं की चमचम करती बालियों को सबसे पहले ‘अग्नि देवता’ को समर्पित किया जाता है। यजुर्वेद ने नए धान्य को ‘वाज’ कहा है। होली की अग्नि-ज्वाला में ‘वाज’ की आहुति दे फिर बालियों को प्रसाद रूप में ग्रहण करना है। नव धान्य से जुड़ा होने के नाते होली हमारे जीवन को चलाने वाला उत्सव है।
वेदों में वर्णित चार प्रमुख उत्सवों में होली एक है। यह जरूर है कि वैदिक काल में जो ‘होलाका’ थी, वह अब ‘होली’ हो गई। ‘काठकगृह्यसूत्र’ ने होली को स्त्रियों के सौभाग्य वृद्धि के लिए संपन्न किया जाने वाला एक अनुष्ठान माना है, जिसके देवता चंद्रमा हैं। ‘तंत्र शास्त्र’ ने फागुनी पूनम को ‘दारुणरात्रि’ कहा है। वहां यह साधना और सिद्धियों को प्राप्त करने की रात्रि है। भारतरत्न डॉ. पांडुरंग वामन काणे ने ‘धर्मशास्त्र के इतिहास’ में होली को भारत में सबसे बड़े उल्लास और आनंद का उत्सव बताया है। यह जरूर है कि होली को मनाने में पूरे देश में भिन्न-भिन्न मान्यताएं और भावनाएं हैं। बंगाल को छोडक़र होलिका-दहन प्राय: सर्वत्र होता है। बंगाल में फाल्गुन पूर्णिमा पर कृष्ण प्रतिमा का झूला प्रसिद्ध है। यह भी कम आश्चर्य की बात नहीं है कि होली पर रंग खेलने की अवधि भी पूरे देश में विभिन्न है। कहीं यह रंगीन बौछारें होली के अगले दिन बरसती हैं, कहीं पांचवें दिन तो कहीं आठवें दिन और कहीं पूरे पखवाड़े तक ही। मस्ती से सराबोर लोग एक-दूसरे के रंग लगाते हैं तो साथ में रंगीन जल की बौछारें भी छोड़ते हैं। पर इन सबके पीछे जो पारंपरिक गूढ धार्मिक तत्त्व छिपा है, वह है पुरोहितों द्वारा होलिका की पूजा और श्रीकृष्ण का गोपियों के साथ रंगीली होली खेलना।
होली का आरम्भिक शब्दरूप होलाका था। जैमिनि एवं शबर का कथन है कि होलाका आर्यों द्वारा सम्पादित होता था। काठकगृह्यसूत्र में लिखा है कि ‘होला एक कर्म-विशेष है, जो स्त्रियों के सौभाग्य के लिए सम्पादित होता है, उस कृत्य में राका (पूर्णचन्द्र) देवता हैं।’ होलाका उन बीस क्रीडाओं में एक है, जो सम्पूर्ण भारत में प्रचलित है। कुछ विद्वानों का दावा है कि होली का उत्सव ईजिप्ट (मिस्र) या ग्रीस (यूनान) से लिया गया है किन्तु यह भ्रामक दृष्टिकोण है। लगता है, इन्होंने भारतीय प्राचीन ग्रन्थों का अवलोकन नहीं किया है। दूसरे, वे खुद इस विषय में भी निश्चित नहीं हैं कि इस उत्सव का उद्गम मिस्र से हुआ है या यूनान से। अत: उनकी धारणा को गंभीरता से नहीं लिया जा सकता। होली के तीन रंंग हैं — एक, जो खेत—खलिहानों में बिखरा है। दूसरा, जो प्रेम और शृंगार में रचा है। तीसरा है, जीवन में घुले रंग। इस नाते यह परिपूर्णता का उत्सव है।
होली का सबसे पुराना वर्णन सातवीं सदी के संस्कृत नाटककार और कन्नौज के महाराज हर्षवर्धन ने अपने ‘रत्नावली’ नाटक में किया है। वहां हो रही होली ‘वसंतोत्सव’ है। स्थान है कौशांबी, आज से ढाई हजार साल पुराना एक सुंदर शहर। अब प्रयाग से दूर कोसम गांव में इस नगर के अवशेष हैं। नाटिका में राजा उदयन अपने किले पर खड़े होकर सारी प्रजा को विभिन्न रंगों से होली खेलते देख प्रमुदित हो रहे हैं। स्त्रियां होली खेलने में व्यस्त हैं। कुंकुम से भरी मुट्ठियां आकाश में उड़कर लाल बादल बना रही हैं। कहीं-कहीं पीले गुलाल से बने बादल यूं लग रहे हैं, मानो वे स्वर्ण के हों। इधर, राजमहल के भीतर होली यूं जमी है कि मदमस्त लोग पिचकारियों से एक-दूसरे पर सुगंधित जल डाल रहे हैं तो महल में भारी कीचड़ मच गया है और मतवाली कामिनियों के मस्तक का सिंदूर पानी के साथ बहकर नीचे तक फैल गया है। पिचकारी का संस्कृत नाम है – शृंगक। कौशांबी में सारे दिन नाच-गान चलता है और फिर सांझ में कामदेव का पूजन। राजा उदयन लाल अशोक के वृक्ष में कामदेव का पूजन करते हैं और प्रजाजन कामदेव के मंदिर में जाकर उन्हें पूजते हैं तथा दांपत्य में अंतरंगता बढ़ाने की याचना भी करते हैं। काम जीवन का उत्स एवं मूल है। यदि उसको कुचला जाए तो वह विकृत रूप धर लेता है। पुरातन ग्रंथों में कामदेव के सुंदर मंदिर हैं, जहां लोग उनकी पूजा करने जाते हैं। होली काम—पूजन का पर्व है।
पहली शताब्दी के लगभग प्राकृत भाषा में लिखी ‘गाहासतसई’ में होली ‘वसंतोत्सव’ न होकर ‘फाल्गुनोत्सव’ है। वहां ‘फाल्गुनोत्सव’ में नदी किनारे इकट्ठे युवक-युवतियां एक-दूसरे पर बिना किसी भेदभाव के नदी का कीचड़ उछाल रहे हैं। ‘गाहासतसई’ की होली गांव की है। अत: गांवों के संसाधन होली खेलने के काम आते हैं। यह गौर करने की बात है कि जब ‘गाहासतसई’ की होली खेली जा रही थी, तब वात्स्यायन अपने ‘कामसूत्र’ में सुवसंतक, उदकक्ष्वेडिका और अभ्यूषखादिका जैसे उत्सवों की चर्चा कर रहे थे। इनमें ‘सुवसंतक’ संभवत: अब मनाए जाने वाली वसंत पंचमी है। ‘उदकक्ष्वेडिका’ पानी की पिचकारियों से रंग खेलने का उत्सव है। ‘अभ्यूषखादिका’ का तात्पर्य नए धान्य को आग में भूनकर खाने से है। ‘कामसूत्र’ की यह होली मुक्त एवं स्वछंद हास-परिहास का उत्सव है।
नाच-गान, हंसी-ठिठोली और मौज-मस्ती की त्रिवेणी है होली। लोक अंचलों में हुए अनेक संस्कृत विद्वानों के साथ ही सारी भारतीय भाषाओं में रंग-बिरंगी होली खेलने का बड़ा मनोहारी व सजीव वर्णन हुआ है। पिछली शताब्दी में हुए रससिद्ध संस्कृत कवि भट्ट मथुरानाथ शास्त्री ने ‘जयपुरवैभवम्’ में उर्दू, ब्रज, ढूंढ़ाडी व संस्कृत, इन चार भाषाओं को एक ही पद्य में ढालकर ऐसा अनूठा प्रयोग होली के लिए किया है, जो शायद ही कहीं हुआ हो-
मौसिमे बहार देख खोला मुंह बुलबुलों ने
आतिशये हिज्र का निकाला इश्क ने शोला
दूधिया छनाओ यार! नीठ नरचोला मिल्यो
बोलाभर पीके फिर बोलो बस बम भोला।
आओला कदेक, कद गाओला रंगीली फाग
ढोला! कद गोराजी ने हिवडै लगाओला
मानिनामनङ्गेनाऽद्य दोलामधिनीतं मनो
नो लास्यं दधाति रसिकानां किमसौ होला?।।
होली पर द्वापर में श्रीकृष्ण से बिछुड़ी एक गोपी मेवाड़ के महलों में एकांत में बैठकर अपने पिया को विरही अश्रुओं से याद कर रही है। इस गोपी का तंबूरा उसकी विरह-वेदना की ज्वाला को और भभका रहा है। यह गोपी है, प्रेमदीवानी मीरा, जो झटककर विधाता से ही पूछ रही है कि- किणु संग खेलूं होरी,
पिया तज गए हैं अकेली! तभी तो श्याम पिया खुद मीरा की चुनरिया को रंगने आते हैं। होली के रंग तो ऐसे अनोखे हैं कि बिना आंखों वाले सूरदास भी उन्हें पहचानते हैं — सूरदास की काली कमरिया, चढ़त न दूजो रंग।।








