
-शास्त्री कोसलेंद्रदास
राम नाम की अलख जगाकर मरुभूमि में तीन शताब्दियों पहले एक संत ने ऐसी आध्यात्मिक नौका का निर्माण किया, जिस पर चढ़कर असंख्य लोग भवसागर से पार हुए। तीन सौ साल पहले जन्मे संत रामचरण ने राम के निर्गुण रूप की साधना पद्धति विकसित कर राम नाम को जन-जन से जोड़ दिया। अठारहवीें शताब्दी के प्रारंभ में उनके द्वारा प्रवर्तित साधना पंथ रामस्नेही संप्रदाय के रूप में तीन सौ वर्षों से भक्ति धारा के विस्तार में संलग्न है। अभी संत रामचरण का 300वां जयंती वर्ष चल रहा है। ऐसे में उनकी स्मृति इसलिए आवश्यक है कि घट-घट में रमने वाले व्यापक राम में सारे समाधान खोज कर अनित्य और असुख संसार से पार पा सकें।
राम राम रसना रटो –
संत रामचरण का जन्म 1719 ईस्वी में राजस्थान में मालपुरा के सोड़ा ग्राम में हुआ। सेठ बख्तराम की संतान रामकृष्ण को राम नाम की ऐसी लौ लगी कि वे घर-परिवार छोड़कर परमात्मा को पाने के मार्ग पर चल पड़े। विनतीराम ने उनके विवाह का उल्लेख किया है, जिसका जिक्र जगन्नाथ के ‘गुरुलीलाविलास’ में भी है। गुरु कृपाराम से श्रीराम भक्ति की दीक्षा पाकर 1760 में ये भीलवाड़ा आ गए। यहीं संत रामचरण ने ‘अनभै-वाणी’ की रचना की। उन्होंने भीलवाड़ा के शाहपुरा में ‘रामद्वारा’ स्थापित किया। रैण, खेड़ापा और सींथल के साथ ही रामस्नेही संप्रदाय के अनेक आश्रम और पीठें उत्तर भारत में स्थित है।
दाता बड़े दयाल –
संत रामचरण ज्ञान, विवेक और अनुभव की ऐसी अनूठी सरिता हैं, जिन्होंने राम नाम की महत्ता बताने के लिए सधुक्कड़ी भाषा में ऐसा साहित्य रचा, जो सुदीर्घ काल से आप्यायित और सम्मोहित किए हुए है। उन्होंने मनुष्य के जन्म से ही श्रेष्ठ होने का अमर शंखनाद किया। मनुष्य की जन्म सत्ता के बजाय उसकी व्यक्ति सत्ता को महत्त्व दिया। मनुष्य होने के आधार पर ‘निर्गुण ब्रह्म’ को खोज लेने का रास्ता दिखा देने वाले रामचरण भक्ति संसार मेें जाति और वर्ण सत्ता के स्वातंत्र्य के प्रतिनिधि थे। उनका संत साहित्य एक तरह से समाज साहित्य है। उसमें वेदांत के गंभीर तत्त्व हैं, जो आम आदमी के बोलचाल की भाषा में लिखे गए हैं। तब का चलता-फिरता आदमी दर्शनशास्त्र की जटिल बातों को आम भाषा में दोहराने लगा – रामचरण वंदन करै सब ईशन के ईश, जग पालक तुम जगत गुरु जग जीवन जगदीश! राम भक्ति की निर्गुण शाखा का आश्रय लेकर संत रामचरण ने जिस तरह तत्कालीन समाज को झकझोरा, वह बेमिसाल है। संत रामचरण कहते हैं, रामचरण कह रामजी येह तुम्हारी चाल, समर्थ राम कृपालु हो दाता बड़े दयाल।
रामानंद से रामचरण –
संत साहित्य के विद्वान मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रवर्तक स्वामी रामानंदाचार्य की परंपरा की शाखा के रूप में रामस्नेही संप्रदाय को स्वीकारते हैं। रामानंद के चलाए भक्ति मार्ग की निर्गुण शाखा का आश्रय लेकर उन्होंने राम नाम के जप का सर्वाधिक महत्त्व दिया। उन्होंने कहा, वे परमात्मा अंतर्यामी हैं, उनका आदि मध्य और अंत कोई नहीं जानता, इसलिए उनकी सेवा करने में करने में कोई समर्थ नहीं है। अत: उस अपरिमित परमात्मा को किसी आकार में बांधना असंभव है।
राम नाम की मस्ती –
संत रामचरण में जहां एक ओर तड़प और आंतरिक अकेलापन है वहीं दूसरी ओर अंदर की मस्ती का ऐसा ज्वार भी है जो पूरी दुनिया को अपने भीतर समेट लेता है। एक ओर अपनी भीतरी यात्रा में इतनी एकाग्रता है कि बाहर से कोई संबंध ही नहीं है। दूसरी ओर गंदगी भरे अपने आसपास के समाज को परिवर्तित करने का पूरा अभियान है। तभी तो कबीर में प्यार और रोष, दोनों का विरोधाभास है। अपने राम में दृढ विश्वास इतना प्रबल है कि वे कहते हैं, तातें रखिए समर्था रामचरण विश्वास, राम सबल छिन एक में देवै सुक्ख विलास। यानी वह परमप्रभु राम एक ही क्षण में सारे सुख अपने भक्त को प्रदान कर देते हैं।
नमो निरंजन कंत –
संत रामचरण ने अपने राम को निर्गुण में खोजा। उनके राम निर्गुण हैं। वे अकाल, अजन्मा, अनाम और अरूप हैं। वे बिना कान के सुनते हैं। बिना पांव के चलते हैं और बिना हाथों के काम करते हैं। संत साहित्य में निर्गुण तथा सगुण कवि, दोनों ईश्वर के राम नाम के आस्वादक हैं। ‘रामचरण बंदन करै, नमो निरंजन कंत’ कहकर उन्हीं परमात्मा को पाना चाहते हैं। मीरा, तुलसीदास, सूरदास और नरसी में सगुण-निर्गुण अधिक संश्लिष्ट है। वहीं कबीर, नानक, दादू और रामचरण रामस्नेही जैसे संत-कवि भी ‘राम’ नाम के सहारे ही परमात्मा तक अपनी पहुंच बना रहे हैं। राम, गोविंद, हरि और कृष्ण ही इनके संबोध्य नाम हैं। रामस्नेही संप्रदाय में परस्पर अभिवादन के लिए ‘रामजी राम, राम महाराज’ बोला जाता है।








